मोहन भागवत ने लंदन में ‘अपनापन’ और ‘हिंदू’ की परिभाषा दी
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38m ago

मोहन भागवत ने लंदन में ‘अपनापन’ और ‘हिंदू’ की परिभाषा दी

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने लंदन में एक कार्यक्रम में ‘हिंदू’ और ‘राष्ट्र’ की अवधारणाओं को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि संघ के कार्य का आधार नफरत नहीं, बल्कि शुद्ध सात्त्विक प्रेम है, और इसका उद्देश्य समाज में लोगों को जोड़ना है। भागवत ने जोर दिया कि ‘हिंदू’ केवल एक धार्मिक पहचान नहीं है, बल्कि एक ऐसी प्रकृति और सोच है जो विविधता को स्वीकार करती है। उन्होंने ‘राष्ट्र’ और ‘नेशन’ के बीच अंतर बताया, जिसमें ‘राष्ट्र’ को एक साझा उद्देश्य और चेतना के रूप में परिभाषित किया गया, जबकि ‘नेशन’ अक्सर राज्य और उसकी व्यवस्था से जुड़ा होता है। भागवत ने व्यक्ति, समाज और प्रकृति की प्रगति के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने ब्रिटेन में रहने वाले हिंदुओं से अपनी कर्मभूमि के प्रति वफादार रहने का आग्रह किया, साथ ही भारत से जुड़े रहने का भी संदेश दिया।

भागवत ने कहा कि हिंदू जीवन दृष्टि में प्रकृति के प्रति प्रेम महत्वपूर्ण है, और मनुष्य को प्रकृति पर विजय पाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, बल्कि उसके साथ आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने ‘अस्तित्व की एकता’ को हिंदू विचार का आधार बताया, जिसमें विविधता के बावजूद एकता पर जोर दिया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि दुनिया में संघर्ष प्रबंधन आसान हो सकता है यदि यह माना जाए कि सभी एक हैं और एक-दूसरे को आगे बढ़ने में सहयोग करना चाहिए।

विभिन्न स्रोतों के अनुसार, भागवत ने सेवा को संघ की सोच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बताया और कहा कि यह किसी पर उपकार करना नहीं है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारत की प्रगति शांति, समृद्धि और मानवता के लिए होनी चाहिए, न कि किसी अन्य देश के खिलाफ।

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