दिल्ली में सर्दियों के महीनों में वायु गुणवत्ता तेजी से खराब हो जाती है। 31 अक्टूबर को दिल्ली का औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 117 था, जो 1 नवंबर को बढ़कर 261 और 2 नवंबर को 324 हो गया। 3 नवंबर की सुबह आठ बजे तक यह 330 तक पहुंच गया, जिससे दृश्यता 100 मीटर से भी कम हो गई। दिल्ली में 60 निगरानी केंद्र हैं, जिनमें से 57 से डेटा उपलब्ध है। प्रदूषण के स्तर में वृद्धि के बाद, दिल्ली-एनसीआर में ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP) का दूसरा चरण लागू कर दिया गया है।
टेरी (TERI) की डॉ. अंजू गोयल के अनुसार, सर्दियों में मौसम की स्थिति प्रदूषण को बढ़ाती है। गाड़ियां, कारखाने, निर्माण कार्य और कचरा जलाने से पूरे साल प्रदूषण होता है, लेकिन सर्दियों में हवा की गति कम होने से धुआं और धूल जमीन के पास जमा हो जाते हैं। हवा की दिशा भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि पराली जलाने वाले क्षेत्रों से आने वाली हवा दिल्ली में प्रदूषण बढ़ा सकती है।
डॉ. गोयल के शोध के अनुसार, दिल्ली के प्रदूषण में पराली का योगदान लगभग 4% है, हालांकि कुछ दिनों में यह बढ़ सकता है। अक्टूबर और नवंबर 2025 के दौरान, पराली के धुएं का औसत योगदान 4.2% था। प्रदूषण के अन्य स्रोतों में खेती से निकलने वाली अमोनिया (27%), वाहन (23%), कचरा और लकड़ी (20%), और धूल (17%) शामिल हैं।
लाहौर भी गंभीर प्रदूषण से जूझ रहा है, जहां मंगलवार सुबह AQI 447 दर्ज किया गया, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशानिर्देशों से 60 गुना अधिक है। दिल्ली में, आईक्यूएयर ने 215 और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 332 का स्तर दर्ज किया। पाकिस्तान सरकार ने ईंट भट्टों के खिलाफ कार्रवाई तेज कर दी है और किसानों से पराली न जलाने की अपील की है। दिल्ली में GRAP के तहत प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों, निर्माण कार्यों और कोयला-लकड़ी के इस्तेमाल पर रोक लगाई गई है। दीवाली के दौरान पटाखों के उपयोग को भी सीमित कर दिया गया है। विशेषज्ञ लंबे समय तक चलने वाले समाधान जैसे स्वच्छ ऊर्जा और बेहतर सार्वजनिक परिवहन की आवश्यकता पर जोर दे रहे हैं।
हमारी समझ यह है कि दिल्ली में सर्दियों में प्रदूषण बढ़ने के कई कारण हैं, जिनमें मौसम की स्थिति, वाहनों और उद्योगों से उत्सर्जन, और पराली जलाना शामिल है। यह स्पष्ट है कि प्रदूषण दिल्ली और लाहौर दोनों में एक गंभीर समस्या है, और दोनों सरकारों ने कुछ कदम उठाए हैं, लेकिन उनकी प्रभावशीलता अभी तक ज्ञात नहीं है। अलग-अलग मीडिया आउटलेट दिल्ली और लाहौर के प्रदूषण पर अलग-अलग ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, और दीवाली के पटाखों के संभावित प्रभाव पर भी अलग-अलग दृष्टिकोण हैं।
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