चीन और भारत के बढ़ते व्यापारिक संबंध और भू-राजनीतिक बदलाव
राजनीति
✓ तटस्थ
1h ago

चीन और भारत के बढ़ते व्यापारिक संबंध और भू-राजनीतिक बदलाव

AI-संश्लेषित · पूर्वाग्रह हटाया · केवल तथ्य
2 स्रोत: 1 वाम · 0 केंद्र · 1 दक्षिण

इस महीने की शुरुआत में किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में आयोजित एससीओ बैठक के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हाथ मिलाने के बाद, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का ब्रिक्स सम्मेलन में हिस्सा लेने भारत आना, दोनों देशों के संबंधों में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत है। यह शी जिनपिंग की पिछले सात सालों में पहली भारत यात्रा है, जो 15 जून 2020 को पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद आई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव दुनिया के तेज़ी से बदलते भू-राजनीतिक हालात और चीन की अर्थव्यवस्था की बढ़ती चुनौतियों से प्रेरित है।

सीमा पर तनाव के बावजूद, भारत और चीन व्यापार के मोर्चे पर बड़े साझेदार हैं, जिनके बीच 151.5 अरब डॉलर का वार्षिक व्यापार होता है, हालांकि चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा 112.16 अरब डॉलर से अधिक है। भारत की औद्योगिक महत्वाकांक्षाएं चीनी तकनीक पर निर्भर हैं, खासकर स्मार्टफ़ोन, टेलीकॉम नेटवर्क और इलेक्ट्रॉनिक्स के कलपुर्जों के लिए। भारत का दवा उद्योग भी चीन से एपीआई आयात पर निर्भर है। वहीं, चीन भारत को एक बड़े बाज़ार के रूप में देखता है, जहाँ 2025 में 15 करोड़ से ज़्यादा स्मार्टफ़ोन बिके, जिनमें से 90% या उनके कलपुर्जे चीन से आयात किए गए थे। शाओमी, वीवो और ओप्पो जैसी चीनी मोबाइल कंपनियों ने भारतीय बाज़ार में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी हासिल की है। चीन की नज़र भारत के कार मार्केट पर भी है, जहाँ 2025 में 45 लाख कारें बिकी हैं।

2020 से पहले, चीनी कंपनियों ने भारतीय स्टार्ट-अप इकोसिस्टम में अरबों डॉलर का निवेश किया था, जिसमें अलीबाबा और टेनसेंट जैसी कंपनियों ने पेटीएम, ज़ोमैटो, ओला इलेक्ट्रिक और बाईजूज़ में फंडिंग की थी। लेकिन गलवान झड़प के बाद, भारत ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए कई चीनी कंपनियों के निवेश को मंज़ूरी देने से इनकार कर दिया। इसके जवाब में, चीन ने भी भारत को दुर्लभ पृथ्वी सामग्री और कारों के लिए मैग्नेट जैसे सामान बेचने से रोकने की कोशिश की।

इस बीच, डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ़ और अमेरिका-ईरान युद्ध ने वैश्विक व्यापार को प्रभावित किया है, जिससे चीन की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा है। अब सवाल यह है कि क्या भारत, चीन और रूस मिलकर वैश्विक व्यवस्था को नया रूप दे सकते हैं, और ब्रिक्स शिखर सम्मेलन इस दिशा में कितना बदलाव लाएगा।

क्या यह उपयोगी था?

मूल कवरेज पढ़ें

💬 टिप्पणियाँ

📜 टिप्पणी नीति