एक नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में इंडिया गठबंधन ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर रैली की, जिसमें कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी दलों ने भाग लिया। कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने पहले ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की थी और 'इलेक्शन कमीशन ठीक करो' अभियान चलाया था, लेकिन इंडिया गठबंधन की रैली से दूरी बनाए रखी। सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने रैली के समर्थन की घोषणा तो की, लेकिन रैली में शामिल न होने का फैसला किया, जिसका कारण स्वतंत्र पहचान बनाए रखना बताया गया। दीपके ने कहा कि वे वोट चोरी के खिलाफ लड़ाई में किसी भी दल का समर्थन करेंगे। रामलीला मैदान में सीजेपी के कुछ कार्यकर्ता ज़रूर मौजूद थे, लेकिन कोई प्रमुख चेहरा मंच पर नहीं दिखा। सीजेपी का प्रदर्शन मतदाता सूची में गड़बड़ी और चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग से जुड़ा हुआ है। वहीं, अरुणाचल प्रदेश में सियांग अपर बांध और मध्य प्रदेश में परमाणु ऊर्जा परियोजना जैसे विकास परियोजनाओं का विरोध भी जारी है, जिसके पीछे जल, जंगल, जमीन और पर्यावरण जैसे मुद्दे प्रमुख हैं। विरोध प्रदर्शनों के पीछे विदेशी फंडिंग और पादरियों के कनेक्शन की भी आशंका जताई जा रही है।
हमारी समझ यह है कि सीजेपी इंडिया गठबंधन की रैली से दूरी बनाकर अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखने का प्रयास कर रही है, भले ही वे चुनाव आयुक्त के इस्तीफे के मुद्दे पर गठबंधन के साथ सहमत हों। ऐसा प्रतीत होता है कि वे किसी भी दल के साथ औपचारिक रूप से जुड़ने से हिचकिचा रहे हैं, लेकिन वोट चोरी के खिलाफ लड़ाई में सहयोग करने को तैयार हैं। यह रणनीति उन्हें अपनी विशिष्ट मांगों और विरोधों पर ध्यान केंद्रित करने की अनुमति दे सकती है, जिनमें विकास परियोजनाएं और पर्यावरण संबंधी मुद्दे भी शामिल हैं।
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