दिल्ली में जंतर-मंतर पर हाल ही में हुए प्रदर्शनों के साथ, आरक्षण विरोधी आंदोलन बीजेपी के लिए एक जटिल राजनीतिक चुनौती बन गया है। एक तरफ, जनरल कैटेगरी के मतदाताओं की नाराज़गी है, जो लंबे समय से बीजेपी के समर्थन का आधार रहे हैं। दूसरी तरफ, ओबीसी, एससी और एसटी समुदायों का समर्थन भी बनाए रखने की चुनौती है, जिनमें बीजेपी ने पिछले एक दशक में अपना सामाजिक आधार बढ़ाया है। आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र, बीजेपी को इस मुद्दे पर सावधानी से आगे बढ़ना होगा।
हिमांशु मिश्रा के अनुसार, 2014 में मोदी युग की शुरुआत के बाद से बीजेपी ने जातियों का एक 'गुलदस्ता' तैयार किया, जिससे पार्टी का वोट शेयर 22% से बढ़कर 37% हो गया। बीजेपी के मूल वोट बैंक, सवर्णों को लगता है कि पार्टी उनसे दूर जा रही है, इसलिए वे सबक सिखाना चाहते हैं। यह पहली बार है जब बीजेपी के मूल वोट बैंक में हलचल देखी जा रही है और पार्टी इस मामले में क्या करे, यह समझ नहीं पा रही है।
आरक्षण विरोधी आंदोलन के प्रतिनिधियों ने जेपी नड्डा से मुलाकात की है, लेकिन बीजेपी इस मांग का समर्थन नहीं कर सकती कि आरक्षण मेरिट के आधार पर हो, क्योंकि इससे ओबीसी वोट बैंक को नुकसान होगा।
अदिति नारायणी पासवान के अनुसार, दलितों के संदर्भ में आरक्षण पर सामाजिक बहस शुरू हो गई है। प्रोफ़ेसर बद्री नारायण का कहना है कि आरक्षण हटाने की हालिया मुहिम का सामाजिक असर महत्वपूर्ण है।
एक अन्य घटनाक्रम में, मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आयोजित ‘यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन’ का विरोध हुआ, जिसमें 61 संगठनों ने भाग लिया। ‘हिंदूज़ फॉर ह्यूमन राइट्स’ संगठन ने भी कार्यक्रम का विरोध किया, जो भारत, हिंदुत्व और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय आलोचनात्मक अभियानों में सक्रिय रहा है। इस संगठन की स्थापना 2019 में हुई थी और यह भारत की नीतियों और हिंदुत्व की आलोचना करने वाले अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क में एक मुखर नाम बन गया है।
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