दिल्ली के रामलीला मैदान में आगामी इंडिया गठबंधन की रैली से विपक्ष चुनाव आयोग के खिलाफ अपने अभियान को आगे बढ़ाने और जनता का समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहा है। माकपा सांसद जॉन ब्रिटास ने दस लाख लोगों के राजधानी पहुंचने का दावा किया है, जबकि कांग्रेस ने अलग-अलग राज्यों से कार्यकर्ताओं को दिल्ली लाने की तैयारी की है। यह रैली संसद के भीतर अपनी मांगों को आगे नहीं बढ़ा पाने के बाद जनता का साथ मांगने का प्रयास है।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास पर सांकेतिक संसद लगाई गई, जहां मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का प्रस्ताव पारित हुआ। राहुल गांधी का कहना है कि लोगों की आवाज़ संसद तक नहीं पहुंचने दी जा रही है, इसलिए विपक्ष को बाहर जुटना पड़ा है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह रैली एसआईआर और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ अभियान को चर्चा में बनाए रखने के लिए है, खासकर त्योहारों के बीच जब लोगों का ध्यान दूसरी बातों में चला जाता है।
हालांकि, व्यापारिक संगठन चैंबर ऑफ़ ट्रेड एंड इंडस्ट्री ने रैली टालने की अपील की है, क्योंकि उन्हें 12,000 करोड़ रुपये के कारोबार पर असर पड़ने की आशंका है। दिल्ली पुलिस ने रैली के लिए अनुमति दे दी है और व्यवस्था को लेकर आयोजकों के साथ तालमेल कर रही है।
कांग्रेस के सामने दो चुनौतियां हैं: अपने कार्यकर्ताओं और सहयोगी दलों को एक मंच पर लाना और उनके माध्यम से उठाए गए सवालों को उन लोगों तक पहुंचाना जो पार्टी की बैठकों या प्रदर्शनों में नियमित रूप से शामिल नहीं होते। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने रैली का समर्थन किया है, लेकिन अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखेगी और प्रदर्शन में शामिल नहीं होगी। CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी से मुलाकात की और 'वोट चोरी' के आरोप को लेकर समर्थन जताया।
इस रैली के आयोजन में कांग्रेस को उम्मीद है कि वे अपना संदेश लोगों तक पहुंचा पाएंगे, लेकिन दस लाख लोगों के आने के दावे से पैदा हुई उम्मीदों के बीच यह एक चुनौती है।
हमारी समझ यह है कि विपक्ष, चुनाव आयोग के खिलाफ अपनी शिकायतों को सार्वजनिक करने और एक व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंचने के लिए रामलीला मैदान में रैली का उपयोग कर रहा है। यह रैली संसद में अपनी मांगों को प्रभावी ढंग से रखने में असमर्थता के जवाब में एक रणनीतिक कदम प्रतीत होती है, जिसका उद्देश्य जनता के समर्थन को जुटाना और सरकार पर दबाव डालना है। व्यापारिक संगठनों की चिंताओं के बावजूद, विपक्ष इस मुद्दे को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए दृढ़ है, खासकर त्योहारों के मौसम में।
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