अमेरिका में 3 नवंबर को मध्यावधि चुनाव होने वाले हैं, जिसमें हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स की 435 और सीनेट की 35 सीटों के लिए मतदान होगा। वर्तमान में, रिपब्लिकन पार्टी के पास दोनों सदनों में बहुमत है, लेकिन डेमोक्रेट्स को नियंत्रण हासिल करने के लिए चार-चार सीटों का लाभ चाहिए। ये चुनाव न केवल राष्ट्रपति ट्रंप की लोकप्रियता का इम्तिहान हैं, बल्कि अमेरिकी कांग्रेस में उनके नियंत्रण की परीक्षा भी हैं। यदि रिपब्लिकन पार्टी दोनों सदनों में बहुमत खो देती है, तो ट्रंप के लिए कानून पास कराना मुश्किल हो जाएगा। भारत के संदर्भ में, यह चुनाव टैरिफ, एच-1बी वीजा और रूस से तेल खरीदने जैसे मुद्दों पर राहत दिला सकता है।
अर्ली वोटिंग पहले ही शुरू हो चुकी है, और अनुमान है कि चार करोड़ अमेरिकी पहले ही वोट डाल चुके हैं। चुनाव परिणाम 4 नवंबर की सुबह भारत में आने शुरू हो जाएंगे। हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स के सभी 435 सदस्यों का कार्यकाल दो साल का होता है, और आमतौर पर प्रस्तावित कानून वहीं पेश किए जाते हैं और उन पर बहस होती है। सीनेट के सदस्यों का कार्यकाल छह साल का होता है, और वे हाउस से भेजे गए कानूनों को मंजूरी देते हैं या रोकते हैं। वर्तमान में, रिपब्लिकन पार्टी के पास सीनेट में 53 सीटें और डेमोक्रेट्स के पास 45 सीटें हैं, साथ ही दो निर्दलीय सीनेटरों का समर्थन भी है।
अमेरिका के कई राज्यों में गवर्नर के चुनाव भी होने वाले हैं, जिनमें कैलिफ़ोर्निया, फ़्लोरिडा, जॉर्जिया और मिशिगन प्रमुख हैं। हालिया सर्वेक्षणों से पता चलता है कि अमेरिकी मतदाता राष्ट्रपति की पार्टी को 'सबक' सिखाने के लिए उनके खिलाफ वोट देने की प्रवृत्ति रखते हैं। विपक्ष का चुनाव आयोग के खिलाफ प्रदर्शन जारी है, और वे रामलीला मैदान में एक रैली करने जा रहे हैं। इसके जवाब में, सत्ता पक्ष देशभर में 'अराजकता हटाओ, लोकतंत्र बचाओ' आंदोलन शुरू करने जा रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि इन आंदोलनों का चुनाव पर तत्काल प्रभाव नहीं पड़ेगा, लेकिन देश की नब्ज को समझना महत्वपूर्ण है। इस रैली की सफलता कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे नहीं चाहते कि यह कमजोर दिखाई दे।
हमारी समझ यह है कि ये मध्यावधि चुनाव अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए एक महत्वपूर्ण परीक्षा हैं, और उनके नियंत्रण को प्रभावित कर सकते हैं। लेख स्पष्ट रूप से बताता है कि यदि रिपब्लिकन पार्टी बहुमत खो देती है, तो कानून पारित करना कठिन हो जाएगा, जो संभावित रूप से भारत के लिए टैरिफ, वीजा और तेल आयात जैसे मुद्दों पर प्रभाव डाल सकता है। हमें लगता है कि विरोध और सत्ताधारी दल दोनों द्वारा किए जा रहे आंदोलन चुनाव के माहौल को और जटिल बना रहे हैं, हालांकि उनका तत्काल प्रभाव अनिश्चित है।
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