दिल्ली में हाल के प्रदर्शनों के दौरान प्रदर्शनकारियों, वकीलों और पत्रकारों के साथ पुलिस के व्यवहार को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान प्रदर्शनकारियों की पिटाई, पुलिस स्टेशन में एक वकील के साथ मारपीट, महिला पत्रकारों के यौन उत्पीड़न और पत्रकारों के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को ज़ब्त करने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए। वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारियों को बुरी तरह पीटा गया और हिरासत में हिंसा बर्दाश्त नहीं की जा सकती। एक वकील के साथ पुलिस स्टेशन में मारपीट की शिकायत भी दर्ज की गई, जिसके सबूत के तौर पर एक पेन ड्राइव में फुटेज होने का दावा किया गया है। महिला पत्रकारों के यौन उत्पीड़न के आरोपों पर, एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने पुलिस जांच पर सवाल उठाते हुए एक महिला कमेटी बनाने का प्रस्ताव रखा। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने एफ़आईआर से सभी को एक साथ सुरक्षा देने का विरोध किया और अधिकारियों को जवाब देने का अवसर देने का आग्रह किया। इसके अतिरिक्त, जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल के रूप में डिनोटिफ़ाई किए जाने और अदालतों के आसपास होने वाले प्रदर्शनों का मुद्दा भी उठाया गया। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) द्वारा आयोजित 'लहरा दो तिरंगा' मार्च के खिलाफ कनॉट प्लेस में याचिका दायर की गई है, जिसमें कहा गया है कि प्रदर्शनों से त्योहारों के मौसम में व्यापारिक गतिविधियों में बाधा आ सकती है। दिल्ली पुलिस ने CJP के प्रदर्शन से लोगों को दूर रहने की अपील की है और सुरक्षा कड़ी कर दी है। मुंबई पुलिस ने आजाद मैदान में सशर्त अनुमति दी है।
हमारी समझ यह है कि सुप्रीम कोर्ट पुलिस की कार्रवाई की गंभीरता से जांच कर रहा है, विशेष रूप से प्रदर्शनकारियों और पत्रकारों के खिलाफ आरोपों को। सॉलिसिटर जनरल द्वारा विरोध के बावजूद, अदालत एक निष्पक्ष जांच और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए उत्सुक प्रतीत होती है। जंतर-मंतर को डिनोटिफाई करने और अदालतों के आसपास प्रदर्शनों के मुद्दे को उठाने से पता चलता है कि अदालत सार्वजनिक सभाओं और सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है।
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