कोलकाता के चोरबागान सरबोजनिन दुर्गा पूजा पंडाल में शनिवार शाम को भगदड़ में कम से कम 19 लोगों की मौत हो गई और करीब 25 लोग घायल हो गए। बारिश के दौरान भीड़ के पंडाल की ओर बढ़ने और संकरे रास्तों के कारण यह हादसा हुआ। पुलिस ने आयोजन समिति के सात लोगों को गैर-इरादतन हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया है। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में भीड़ को बैरिकेड तोड़ते हुए और पुलिसकर्मियों को धक्का देते हुए देखा जा सकता है, जिससे पहले ही हादसे का डर सताने लगा था। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, पंडाल में प्रवेश करने के लिए लंबी कतारें थीं और भीड़ को नियंत्रित करने में कठिनाई हो रही थी। कोलकाता पुलिस ने पूजा के दौरान पूरे शहर में 12,000 पुलिसकर्मियों को तैनात करने की घोषणा की थी, लेकिन कई लोगों ने हादसे के समय घटनास्थल पर पुलिसकर्मियों की कमी की शिकायत की। राजनीतिक विश्लेषक पॉलमी नाग ने फेसबुक पर लिखा कि पिछले 34 वर्षों में वामपंथी शासन और 15 वर्षों में तृणमूल शासन के दौरान दुर्गा पूजा के दौरान कुचलकर किसी की मौत नहीं हुई। एनडीएमए की 2014 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत और विकासशील देशों में भीड़ हादसे अक्सर धार्मिक स्थलों पर होते हैं, खासकर जब भीड़ क्षमता से अधिक हो जाती है या प्रवेश और निकास संकरे होते हैं। इस घटना के बाद प्रशासन ने कई व्यस्त पंडालों में अस्थायी रूप से आगंतुकों को बंद करने का आदेश दिया है। यह महत्वपूर्ण है कि किसी स्थान पर किसी भी समय कितने लोग मौजूद हैं, वे किस दिशा में जा रहे हैं, और उस स्थान की उन्हें संभालने की क्षमता क्या है। अभी भी यह स्पष्ट नहीं है कि भीड़ प्रबंधन में क्या चूक हुई और भविष्य में इस तरह की घटनाओं को कैसे रोका जा सकता है।
हमारी समझ यह है कि यह घटना भीड़ नियंत्रण और सार्वजनिक सुरक्षा उपायों की अपर्याप्तता को दर्शाती है, खासकर धार्मिक उत्सवों के दौरान। रिपोर्ट इंगित करती है कि संकरे रास्ते, बारिश और भीड़ की अत्यधिक संख्या ने एक खतरनाक स्थिति पैदा की, जिसके परिणामस्वरूप दुखद मौतें हुईं। यह भी स्पष्ट है कि प्रत्यक्षदर्शियों ने घटनास्थल पर पर्याप्त पुलिस उपस्थिति की कमी महसूस की, जिससे स्थिति और खराब हो गई।
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